25 Dec 2013

एल अलग-सा स्वाभिमान...

शहर में न्यूनतम तापमान और कोहरा जहां ऊनी कपड़ों के बावजूद शरीर को कंपकंपाने पर मजबूर कर रहा था वहीँ पैरों में मात्र एक फटा हुआ जुराबों का जोड़ा पहने चलने में असहज सी लगने वाली एक शिथिल सी कंपकंपाती काया लोगों की भीड़ में खुद का भार बहुत ही मुश्किल से उठा पा रही थी। जहां स्टेशन पर कोई अपना बैग भी उठा पाने में खुद असमर्थ पा रहा था वहीँ अस्सी के करीब की वह काया अपना बोझ ही नहीं सर पर एक गठरी भी लादे हुए थी। उसके प्रति क्षण भर के लिए दयभााव सा जागृत हुआ मेरे मन में क्योंकि बदन पर भी बस कहने मात्र को ही कपड़े थे उस वयोवृद्ध के। मैं ऊनी कपड़ों में लिपटी मुँह को भी ढांपे हुए ठण्ड की ठिठुरन को महसूस कर रही थी लेकिन क्या उस व्यक्ति की देह को ज़रा भी एहसास नहीं था ओंस की बूंदों में नहाती हुई उस ठण्ड का... ये मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था। स्टेशन पर मैं ही नहीं, हर आने जाने वाला, प्रत्येक मिलने बिछड़ने वाला बस खुद को ठण्ड से बचाने के प्रयास में था। लेकिन जैसे ही नजरें भीड़ में भी मेरा आकर्षण अपनी ओर र्खींचने वाली देह के चेहरे पर पड़ी आँखें उसकी मुस्कराहट से वशीभूत हो गयी और खुद को बचा नहीं पाई।
    उसके चेहरे की वो मुस्कराहट मेरी आँखों से होती हुई पूरे चेहरे पर आ गयी। उस काया के लिए मेरा दयाभाव अब तक पूर्णतः ख़त्म हो चुका था और उसके प्रति मेरे मन-मस्तिष्क में इज्जत और आदर ने नयी जगह बना ली थी। उसके चेहरे की चमक में डूबी मैं उसकी हिम्मत और इच्छाशक्ति का आंकलन कर ही रही थी कि तभी पास में ही बैठे पापा की आवाज ने मेरा ध्यान तोड़ा। मैंने उनकी ओर देखा तो पाया कि मुझे आकर्षित करने वाली बुजुर्ग-सी, शायद पुरानी चीजे बिनने वाली, महिला उनसे किसी ट्रेन के बारे में पूछताछ कर रही थी और पापा बड़े सत्कार के साथ अम्मा पुकारते हुए उन्हें अपनी जगह बैठने को कह रहे थे। वो इससे बहुत खुश थी उनके चेहरे में भी मैंने एक अलग सी मुस्कराहट देखी जो कि शायद स्वाभिमान की थी। इन सबके बीच बोझ उठाए हुए वह काया मेरे पास बैठ पापा से बातें कर रही थी शायद मेरे बारे में ही पूछ रही थी। मैं उनके वार्तालाप से अलग किसी सोच में डोबी हुई थी। शायद मेरे मन में किसी के प्रति जो भावनाएं पैदा होती हैं वो मुझे विरासत में ही मिली हैं इसीलिए कुछ ऐसी चेतना से वशीभूत होकर मैंने भी वो मुस्कराहट महसूस की.....
   पापा उस अम्मा के लिए टिकट खरीद के ले आये थे लेकिन इस बीच उस अम्मा और मेरे बीच कोई बात नहीं हुई शायद मैं उसे देखने में इतनी खोयी हुई थी कि मुझे बात करने का होश ही नहीं। शायद इसका एक कारण ये भी था कि वह अम्मा इतनी व्यस्त थी कि उसे किसी से कुछ बात करने का समय ही नहीं था। थोड़ा अटपटा लगेगा पर हाँ वह व्यस्त थी… वह अपनी पोटली में से पांच-पांच रुपये के कुछ सिक्के और नोट गिनने में व्यस्त थी। चुनिंदा से दिखने वाले वे उन सिक्कों और नोट को न जाने कितनी ही बार गिन चुकी थी पर उसे संतोष नही मिल रहा था। तभी पापा वहाँ पहुँच गए और उनकी बताई हुई जगह का टिकट थमाते हुए बोले कि अम्मा इसे सम्भाल कर रखना। अब आश्चर्य तो उस स्वाभाविक ही स्वाभिमानी दिखने वाली अम्मा के गुरूर से हुआ जो टिकट के लिए पापा की ओर पैसे बढ़ा रही थी। ताज्जुब तो ये था कि वह पापा के इंकार करने पर मेरे हाथों में उन रुपयों को थमाने लगी। मैंने भी उन्हें पकड़ने से इंकार किया तो उसने हाथ जोड़ते हुए उन्हें पकड़ लेने की विनती हमसे की जिस कारण पापा को उसका मन रखने के लिए पांच का एक सिक्का पकड़ना ही पड़ा। भले ही वो टिकट की कीमत से कहीं कम था लेकिन उस अम्मा द्वारा हमें दिए हुए असीम आशीर्वाद की कोई कीमत नहीं थी जो वह लगातार चलते हुए हर एक कदम के साथ हमे दे रही थी। आज शायद मुझे किसी के स्वाभिमान का साक्षात रूप देखने को मिला था साथ ही अपने भीतर की कुछ संवेदनाओं का भी पता चला था।
    एक साधारण से दिखने वाले इंसान के भीतर भी कितना स्वाभिमान हो सकता है हम सभी शायद कल्पना भी नहीं कर सकते लेकिन वहीँ आज की भागदौड़ में खुद को सभी के समक्ष अच्छा दिखाने के लिए वर्तमान में युवा पीढ़ी अपना मान-सम्मान एक ओर रख कर बस दौड़ में शामिल होने के लिए आतुर है जो कि सही नहीं है। दिखावे और अच्छी छवि के पीछे भागते हुए खुद की हस्ती कहीं खोने लगें हैं सभी.... ऐसे में हमे अम्मा जैसे लोगों से कुछ प्रेरणा लेने की जरूरत है जो ना स्वाभिमानी हैं बल्कि उस स्वाभिमान को बनाये रखने के लिए अडिग भी हैं.…
                                                                                         मीनाक्षी  उनियाल

2 comments:

  1. आजकल की भागदौड़ में हम इस कदर शामिल हो गए हैं कि लड़खड़ाते लेकिन स्वाभिमान से चलने वाले उन कदमों की आहट भी हम तक पहुंचने में असमर्थ है। जाने अनजाने में हम अपनी धरोहर और अपने संस्कारों को नज़अंदाज कर जाते है...और ये दौड़ केवल दिखावे की है जिसके चक्कर में हम अपने जीवन के महत्वपूर्ण पन्नों पर गौर करना भूल जाते है।

    इस लेख के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया......

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    1. इस लेख के सार को समझने और पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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