नए राज्यों का गठन कहीं भारतीय इतिहास को ना दोहराए...
सबसे पहले तो समूचे भारत को तेलंगाना के रूप में 29 वां राज्य गठित होने क लिए शुभकामनाएं जो कि आने वाले 6 महीनों में हम सभी भारतवासियों के सम्मुख होगा। ये जीत किसी पार्टी की नहीं है जिन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकृत किया बल्कि आम जनता की है जिन्होंने इसे मूर्त रूप देने के लिए सरकार को प्रतिबद्ध किया। एक अलग राज्य के लिए करीब दस वर्ष तक चला आन्दोलन नया अध्याय लिखने में पूर्णत: सार्थक हुआ है।
कई बुद्धिजीवी इसके पक्ष में तो कई इसके विपक्ष में हैं और सभी के अपने मत और तर्क हैं। भाजपा चुनाव समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले के पश्चात ट्वीट किया था कि ये आम जनता की जीत है। तेलंगाना के नए राज्य में गठित होने की खबर ने राजनीतिज्ञों को एक नया मुद्दा तो दे ही दिया है लेकिन साथ ही समूचे देश को ये भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं इसी तरह से होते नए राज्यों का गठन भारत को उसके इतिहास में ले जाकर न खड़ा कर दे। इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि जहां हमने अपनी एकता, अखंडता और संप्रभुता को खोया वहीँ हम अपनी भारतीयता से भी विमुख हो बैठेंगे।
भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिल जाने के बाद जिस तरह हमारे नेताओं ने अलग-अलग रियासतों में बंटे भारत को एकता के सूत्र में बांधे रखने क लिए प्रयास किये थे वे कहीं विफल न हो जाएँ। भारतीय संविधान में एकता, अखंडता, संप्रभुता का उल्लेख मात्र उल्लेख भर नही है बल्कि ये तो ऐसा सूत्र है जो भारत को विश्व में एक अलग पहचान दिलाता है। ऐसे में एक के बाद एक अलग होते राज्य बिखराव की स्थिति को सामने न ले आयें।
......
to be continue...
सबसे पहले तो समूचे भारत को तेलंगाना के रूप में 29 वां राज्य गठित होने क लिए शुभकामनाएं जो कि आने वाले 6 महीनों में हम सभी भारतवासियों के सम्मुख होगा। ये जीत किसी पार्टी की नहीं है जिन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकृत किया बल्कि आम जनता की है जिन्होंने इसे मूर्त रूप देने के लिए सरकार को प्रतिबद्ध किया। एक अलग राज्य के लिए करीब दस वर्ष तक चला आन्दोलन नया अध्याय लिखने में पूर्णत: सार्थक हुआ है।
कई बुद्धिजीवी इसके पक्ष में तो कई इसके विपक्ष में हैं और सभी के अपने मत और तर्क हैं। भाजपा चुनाव समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले के पश्चात ट्वीट किया था कि ये आम जनता की जीत है। तेलंगाना के नए राज्य में गठित होने की खबर ने राजनीतिज्ञों को एक नया मुद्दा तो दे ही दिया है लेकिन साथ ही समूचे देश को ये भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं इसी तरह से होते नए राज्यों का गठन भारत को उसके इतिहास में ले जाकर न खड़ा कर दे। इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि जहां हमने अपनी एकता, अखंडता और संप्रभुता को खोया वहीँ हम अपनी भारतीयता से भी विमुख हो बैठेंगे।
भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिल जाने के बाद जिस तरह हमारे नेताओं ने अलग-अलग रियासतों में बंटे भारत को एकता के सूत्र में बांधे रखने क लिए प्रयास किये थे वे कहीं विफल न हो जाएँ। भारतीय संविधान में एकता, अखंडता, संप्रभुता का उल्लेख मात्र उल्लेख भर नही है बल्कि ये तो ऐसा सूत्र है जो भारत को विश्व में एक अलग पहचान दिलाता है। ऐसे में एक के बाद एक अलग होते राज्य बिखराव की स्थिति को सामने न ले आयें।
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