19 Jan 2015

दिल्ली चुनाव: AAP vs AAP !



दिल्ली विधानसभा चुनाव अब आम आदमी पार्टी और उसके पूर्व सदस्यों के बीच एक युद्ध का आकार लेता दिख रहा  है । अभी तक राजधानी में जारी चुनावी लड़ाई में सबसे आगे रहने वाली असली भाजपा अब कहीं कोने में सिमटती दिख रही है। हाल ही में बीजेपी द्वारा 'आप' के सदस्यों को पार्टी में शामिल करना एक सोच-विचारकर उठाया गया कदम है लेकिन इससे कहीं न कहीं हताशा का संकेत भी मिलता दिख रहा है।पिछले कुछ दिनों में तेजी से बीजेपी में सदस्यों का शामिल होना, मुख्यतः 'आप' के नेताओं का, पार्टी के कुछ अनाकर्षक मुद्दों को उजागर करता है।

सबसे पहले, अन्य दलों के ऐसे नेताओं को पार्टी में जोश और उत्साह के साथ शामिल करना जिन्हें जनता ने पहले ही नकार दिया है, साफ़ दर्शाता है कि पार्टी के पास खुद की बहुत ज्यादा सूख चुकी शाखाएं हैं और वे इसमें कुछ नहीं कर सकते। शाज़िया इल्मी और विनोद कुमार बिन्नी जैसी पसंद अपने दम पर ज्यादा वज़न नहीं उठा सकते, उन्हें मिलने वाला मीडिया का ध्यान उनकी राजनीतिक छवि के मुकाबले कहीं अधिक है। पार्टी में इन्हें शामिल करने का यदि एकमात्र उद्देश्य केजरीवाल की पार्टी पर कीचड़ उछालना है, तो इससे मात्र यही साबित होता है कि दिल्ली में भाजपा अपने विचारों से बाहर चली गयी है। साथ ही, यह प्रतिद्वंद्वी दल को टक्कर देने में पार्टी की असमर्थता और अपने दल के नेताओं में आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है।

दूसरा यह कि पार्टी मानती है कि, द्वेषता के चलते ही सही, आप अन्य दलों की तुलना में बहुत होशियार है इसलिए उसके प्रति दृष्टिकोण अलग होना ही चाहिए।




                                                                              to be continued........
                                                                         
                                                                                          मीनाक्षी उनियाल

                                                                                                               

25 Dec 2013

एल अलग-सा स्वाभिमान...

शहर में न्यूनतम तापमान और कोहरा जहां ऊनी कपड़ों के बावजूद शरीर को कंपकंपाने पर मजबूर कर रहा था वहीँ पैरों में मात्र एक फटा हुआ जुराबों का जोड़ा पहने चलने में असहज सी लगने वाली एक शिथिल सी कंपकंपाती काया लोगों की भीड़ में खुद का भार बहुत ही मुश्किल से उठा पा रही थी। जहां स्टेशन पर कोई अपना बैग भी उठा पाने में खुद असमर्थ पा रहा था वहीँ अस्सी के करीब की वह काया अपना बोझ ही नहीं सर पर एक गठरी भी लादे हुए थी। उसके प्रति क्षण भर के लिए दयभााव सा जागृत हुआ मेरे मन में क्योंकि बदन पर भी बस कहने मात्र को ही कपड़े थे उस वयोवृद्ध के। मैं ऊनी कपड़ों में लिपटी मुँह को भी ढांपे हुए ठण्ड की ठिठुरन को महसूस कर रही थी लेकिन क्या उस व्यक्ति की देह को ज़रा भी एहसास नहीं था ओंस की बूंदों में नहाती हुई उस ठण्ड का... ये मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था। स्टेशन पर मैं ही नहीं, हर आने जाने वाला, प्रत्येक मिलने बिछड़ने वाला बस खुद को ठण्ड से बचाने के प्रयास में था। लेकिन जैसे ही नजरें भीड़ में भी मेरा आकर्षण अपनी ओर र्खींचने वाली देह के चेहरे पर पड़ी आँखें उसकी मुस्कराहट से वशीभूत हो गयी और खुद को बचा नहीं पाई।
    उसके चेहरे की वो मुस्कराहट मेरी आँखों से होती हुई पूरे चेहरे पर आ गयी। उस काया के लिए मेरा दयाभाव अब तक पूर्णतः ख़त्म हो चुका था और उसके प्रति मेरे मन-मस्तिष्क में इज्जत और आदर ने नयी जगह बना ली थी। उसके चेहरे की चमक में डूबी मैं उसकी हिम्मत और इच्छाशक्ति का आंकलन कर ही रही थी कि तभी पास में ही बैठे पापा की आवाज ने मेरा ध्यान तोड़ा। मैंने उनकी ओर देखा तो पाया कि मुझे आकर्षित करने वाली बुजुर्ग-सी, शायद पुरानी चीजे बिनने वाली, महिला उनसे किसी ट्रेन के बारे में पूछताछ कर रही थी और पापा बड़े सत्कार के साथ अम्मा पुकारते हुए उन्हें अपनी जगह बैठने को कह रहे थे। वो इससे बहुत खुश थी उनके चेहरे में भी मैंने एक अलग सी मुस्कराहट देखी जो कि शायद स्वाभिमान की थी। इन सबके बीच बोझ उठाए हुए वह काया मेरे पास बैठ पापा से बातें कर रही थी शायद मेरे बारे में ही पूछ रही थी। मैं उनके वार्तालाप से अलग किसी सोच में डोबी हुई थी। शायद मेरे मन में किसी के प्रति जो भावनाएं पैदा होती हैं वो मुझे विरासत में ही मिली हैं इसीलिए कुछ ऐसी चेतना से वशीभूत होकर मैंने भी वो मुस्कराहट महसूस की.....
   पापा उस अम्मा के लिए टिकट खरीद के ले आये थे लेकिन इस बीच उस अम्मा और मेरे बीच कोई बात नहीं हुई शायद मैं उसे देखने में इतनी खोयी हुई थी कि मुझे बात करने का होश ही नहीं। शायद इसका एक कारण ये भी था कि वह अम्मा इतनी व्यस्त थी कि उसे किसी से कुछ बात करने का समय ही नहीं था। थोड़ा अटपटा लगेगा पर हाँ वह व्यस्त थी… वह अपनी पोटली में से पांच-पांच रुपये के कुछ सिक्के और नोट गिनने में व्यस्त थी। चुनिंदा से दिखने वाले वे उन सिक्कों और नोट को न जाने कितनी ही बार गिन चुकी थी पर उसे संतोष नही मिल रहा था। तभी पापा वहाँ पहुँच गए और उनकी बताई हुई जगह का टिकट थमाते हुए बोले कि अम्मा इसे सम्भाल कर रखना। अब आश्चर्य तो उस स्वाभाविक ही स्वाभिमानी दिखने वाली अम्मा के गुरूर से हुआ जो टिकट के लिए पापा की ओर पैसे बढ़ा रही थी। ताज्जुब तो ये था कि वह पापा के इंकार करने पर मेरे हाथों में उन रुपयों को थमाने लगी। मैंने भी उन्हें पकड़ने से इंकार किया तो उसने हाथ जोड़ते हुए उन्हें पकड़ लेने की विनती हमसे की जिस कारण पापा को उसका मन रखने के लिए पांच का एक सिक्का पकड़ना ही पड़ा। भले ही वो टिकट की कीमत से कहीं कम था लेकिन उस अम्मा द्वारा हमें दिए हुए असीम आशीर्वाद की कोई कीमत नहीं थी जो वह लगातार चलते हुए हर एक कदम के साथ हमे दे रही थी। आज शायद मुझे किसी के स्वाभिमान का साक्षात रूप देखने को मिला था साथ ही अपने भीतर की कुछ संवेदनाओं का भी पता चला था।
    एक साधारण से दिखने वाले इंसान के भीतर भी कितना स्वाभिमान हो सकता है हम सभी शायद कल्पना भी नहीं कर सकते लेकिन वहीँ आज की भागदौड़ में खुद को सभी के समक्ष अच्छा दिखाने के लिए वर्तमान में युवा पीढ़ी अपना मान-सम्मान एक ओर रख कर बस दौड़ में शामिल होने के लिए आतुर है जो कि सही नहीं है। दिखावे और अच्छी छवि के पीछे भागते हुए खुद की हस्ती कहीं खोने लगें हैं सभी.... ऐसे में हमे अम्मा जैसे लोगों से कुछ प्रेरणा लेने की जरूरत है जो ना स्वाभिमानी हैं बल्कि उस स्वाभिमान को बनाये रखने के लिए अडिग भी हैं.…
                                                                                         मीनाक्षी  उनियाल

1 Dec 2013

तेलंगाना का गठन कहीं देश में बिखराव न ले आए


भारत को तेलंगाना के रूप में 29 वां राज्य सत्ता सरकार के तोहफे की तरह है। इस नए राज्य तेलंगाना पर एक नजर डाली जाए तो पता चलेगा कि राज्य बनने के बाद इसका क्षेत्रफल 1.14 लाख वर्ग किलोमीटर होगा और इसकी आबादी 35.38 करोड़ होगी। आंध्र प्रदेश की 294 विधानसभा सीटों में से जहां 117 विधानसभा सीट तेलंगाना में हैं, वहीँ तेलंगाना क्षेत्र से लोकसभा में 17 सांसद हैं। राजनैतिक परिपेक्ष्य में तेलंगाना के गठन को इसे प्रस्तावित करने वाले दल की जीत के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन ये जीत तो आम जनता की है जिन्होंने इसे मूर्त रूप देने के लिए सरकार को प्रतिबद्ध किया। इसलिए कहा जा सकता है कि एक अलग राज्य के लिए करीब पांच दशक तक चला आन्दोलन नया अध्याय लिखने में पूर्णत: सार्थक हुआ है। लेकिन शुरू से ही कई बुद्धिजीवी इसके पक्ष में तो कई इसके विपक्ष में हैं और सभी के अपने मत और तर्क हैं।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले के पश्चात ट्वीट किया था कि ये आम जनता की जीत है। तेलंगाना के नए राज्य में गठित होने की खबर ने राजनीतिज्ञों को एक नया मुद्दा तो दे ही दिया है लेकिन साथ ही समूचे देश को ये भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं इसी तरह से होते नए राज्यों का गठन भारत को उसके इतिहास में ले जाकर न खड़ा कर दे। इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि जहां हमने अपनी एकता, अखंडता और संप्रभुता को खोया नहीं, वहीँ हम अपनी भारतीयता से भी विमुख हो बैठेंगे।

आंध्र और तेलंगाना को मिलाकर 1 नवंबर, 1956 को गठित हुआ राज्य आंध्र प्रदेश एक बार फिर भाषा के आधार पर विभाजित होकर दो राज्यों में बँट जाएगा। वहीँ भाषिक आधार पर गठित आंध्र प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका विभाजन होगा। वहीँ कांग्रेस कार्य समिति ने तेलंगाना के गठन की मांग करने वाले प्रस्ताव में अगले 10 वर्ष के लिए हैदराबाद को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की संयुक्त राजधानी रहने की बात कही है। तेलंगाना के गठन के लिए केंद्र सरकार ने 2009 से सक्रिय प्रयास शुरू किए थे और इस दौरान किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच पाने के कारण सत्तारूढ़ सरकार को राज्य के चुनाव में काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव से पहले कांग्रेस इस मुद्दे को सुलझाने में लगी है।

अब देखना ये है कि भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिल जाने के बाद जिस तरह हमारे नेताओं ने अलग-अलग रियासतों में बंटे भारत को एकता के सूत्र में बांधे रखने क लिए प्रयास किये थे वे कहीं इस पृथक राज्य के गठन के बाद विफल न हो जाएँ। भारतीय संविधान में एकता, अखंडता, संप्रभुता का उल्लेख मात्र उल्लेख भर नही है बल्कि ये तो ऐसा सूत्र है जो भारत को विश्व में एक अलग पहचान दिलाता है। ऐसे में अलग होते राज्य देश में बिखराव की स्थिति को सामने न ले आए।
मीनाक्षी उनियाल 

7 Nov 2013

क्या कहूँ क्या हूँ मैं ...

क्या कहूँ क्या हूँ मैं ...
एक कण एक आवाज हूँ मैं
एक बिखरी हुई माला का
अनछुआ तार हूँ मैं
क्या कहूँ क्या हूँ मैं ...
धरातल में अंकुरित बीज हूँ
या कहूँ सीपी का मोती हूँ मैं
पारदर्शी छाया का
छुआ हुआ साज़ हूँ मैं
क्या कहूँ क्या हूँ मैं ...
छिपा हुआ कीमती सामान हूँ मैं
अलग खुद का एक आकाश हूँ
अँधेरे में भ्रम का साथ हूँ
हर इंसां का एहसास हूँ मैं
क्या कहूँ क्या हूँ मैं ...
                मीनाक्षी उनियाल

10 Sept 2013

An undelievered letter...



आज कुछ तन्हाई सी थी चारों ओर ... कारण तो कुछ भी नही था। काफी सोचने पर भी श्रेया को अपनी उदासी और आसपास फैली तन्हाई की परतों के पीछे कोई कारण नहीं मिला...  कहीं न कही कोई तो कारण शायद था। नहीं तो हमेशा चहकने वाली श्रेया अचानक यूँ अकारण ही गुमसुम न हो जाती। ऐसे में श्रेया ने अपने को संभाले केबिन में ही व्यस्तता ना होते हुए भी खुद को काम में तल्लीन करने के खूब प्रयास किए। लेकिन कहीं न कहीं वो इन प्रयासों में विफल सी हो रही थी।

श्रेया की इस ख़ामोशी को साथ के अन्य कई कर्मचारियों ने भी महसूस किया था। हर मीटिंग में एक आध सुझाव देने वाली ये लड़की आज अचानक आधे में ही उठ खड़ी क्यों हुई और सब अधर में ही छोड़ क्यों ऑफिस से चली गयी, कोई नहीं जान पाया था पर सबको श्रेया की भावभंगिमाएं कुछ अटपटी सी जरुर लगी थी। लेकिन ना ही किसी ने पूछने की गुस्ताखी की और ना ही पीठ पीछे बातें बनाने से ही खुद को रोक पाए। सभी को लगा कि शायद उसे किसी अपने से धोका मिला है या फिर उसका कोई अपना उसे छोड़ गया है। जितने लोग उतनी बातें ... किसी के मुंह को कौन बंद कर सकता था। आज सभी के पास पहली बार श्रेया की बातें बनाने का मौका था क्योंकि इससे पहले उसने अपनी हाजिरजवाबी, समझदारी, कर्तव्यनिष्ठा से कभी भी किसी को भी ऐसा मौका ही नहीं दिया था।
        
श्रेया तूफ़ान की तरह ऑफिस से बहार आ चुकी थी और अपनी कार के दरवाजे के सामने आकर ठिठक-सी गयी थी। अचानक सूर्य की किरणों की तपन अपने पर महसूस हुई तो नज़रें स्वत: आसमान की ओर उठ गईं। आज मौसम साफ़ था लेकिन श्रेया को आसमान में मिट्टी-सी दिखाई पड़ रही थी। कुछ सोचे बिना ही कार में बैठ तो गयी लेकिन उसकी बिना बात की झुंझलाहट
न  जाने क्यों उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। पहले हाथ ये सोच के एफ एम को चलाने के लिए बढ़े की शायद नए पुराने गाने उसका मन बहला पाने में सफल होंगे  ...
 " दिल मेरा चुराया क्यों ... जब ये दिल तोड़ना ही था ... हमसे दिल, लगाया क्यों, हमसे मुंह मोड़ना ही था  ...  आंखू में आंसू छुपे थे कहीं .... इनको छलकना तूने सिखाया"  गाने के इन शब्दों के साथ श्रेया का अंतर्मन छल्ली होते हुए आँखों को पानी से लबालब कर कुछ ही देर में आंसुओं का सैलाब बन ज्वालामुखी की तरह फुट पड़ा 

तभी अचानक गाना रुक और आर जे के "दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
                                                             तमाशबीन दुकानें लगाए बैठे हैं "
  के ये शब्द सुनाई दिए, लगा उसी का हाल-ए-दिल बयां किया जा रहा है वो भी लाइव ......
                                     
                                                                                                       मीनाक्षी उनियाल


5 Aug 2013

दुर्गा शक्ति नागपाल की दुर्दशा के लिए केवल नेताओं को दोष न दें



   दुर्गा शक्ति नागपाल के लिए झूठे आंसू क्यों? क्या हम सच में कोई परवाह करते हैं? अगर हम करते भी हैं तो शायद देश के सबसे बेहतर समय यापन के माध्यम राजनीति में ही उलझकर रह जाते हैं और इससे परे कुछ सोच ही नहीं पाते। दुर्गा शक्ति नागपाल पहली ऐसी ईमानदार अफसर नहीं जिन्हें सत्ता संभाले हुए लोगों का शिकार होना पड़ा हो और न ही वे आखिरी ही होंगी। लेकिन अगर किसी ने पीछे मुड़ के ऐसी ही पहले घटित हुई कुछ घटनाओं पर गौर किया हो तो ये स्वयं ही ज्ञात हो जाएगा कि जनता का गुस्सा मात्र तमाशा भर है।  यदि हम वास्तविक तौर पर इस सम्बन्ध में गंभीर हैं तो हमारे पास एक ईमानदार व्यक्ति को राजनीतिक वर्ग और भ्रष्ट वर्ग के अफसरों से बचाने के लिए एक तराशी हुई और पूर्णतः स्पष्ट व्यवस्था है।
   जब एक ईमानदार अफसर शिकार बनता है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया राजनीतिज्ञों पर शिकंजा कसने की होती है। वे देश के सबसे प्रिय पंचिंग बैग हैं। कहीं भी कुछ भी गलत होता है तो उन्हें काफी भारी भरकम व लम्बा पंच मार दिया जाता है। यह हमारे भीतर से आत्मग्लानि का भार निकालने में सहायक तो होता ही है साथ ही हमें  और हमारे व्यक्तित्व को सुन्दर और अंतर्विवेकशील भी बनता है। ये भी सच है की हम अपने जैसे और अपने से सम्बंधित साथी अथवा ब्यूरोक्रेट्स की हो रही आलोचना पर मूक होकर निर्भीकता त्याग देते हैं। उस समय ये सोचा जाता है कि यह तो सम्बंधित वर्ग द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रिया है।  क्या वे लोग हम में से ही नहीं हैं? स्पष्ट रूप से कहा जाए तो हम सभी अविश्वसनीय रूप से पाखंडपूर्ण व्यवहार करने वाले लोग हैं।
        
                                                                                
                                                                                            मीनाक्षी उनियाल




एक गलती...

एक गलती की तन्हाई में
जो उस हस्ती से मिल बैठे,
राहगुजर होकर न जाने क्यों
सड़क किनारे जा बैठे,
एक सवार को रोककर यूँ ही
अपना ही पता पूछ बैठे,
ये खता हुई हमसे न जाने क्यूँ
अनजान राही संग जो चल बैठे,
अपने भी थे रंग कई फिर भी
न जाने क्यों उसका रंग ले बैठे,
एक गलती की तन्हाई में
जो उस हस्ती से मिल बैठे...
                                                                 मीनाक्षी उनियाल