स्वप्न-सृष्टि


सपनों की रंगोली.....

आज की सुबह कुछ अलग नहीं थी सबके लिए, लेकिन प्रत्युषा के लिए थी...। ना जानें कौन-सी कोंपलें अचानक उसके मन में फूट पड़ी थी। चेहरे पर दबी मुस्कुराहट मानो आसपास सबको बताना चाहती थी कि आज उससे ज्यादा खुश और कोई भी नहीं इस धरती पर। गरमी के थपेड़ों से परेशान थे सभी... पर प्रत्युषा! उसे तो ना जाने कहां से समुद्र की ठंडी लहरों को छूकर आती हवा का स्पर्श हो रहा था। आज सवेरे उठ भी तो 4 बजे गई थी या यह कहना गलत न होगा कि सारी रात उसे चांद देखने की लालसा ने जगाए रखा था।

सभी सहेलियां उसे चिढ़ाए आगे बढ़ रही थीं और प्रत्युषा अपनी ही उमंग में न जाने किन-किन रंगों का समावेश कर अपने सपनों की रंगोली में भर रही थी। किसी की कोई सुधबुध ही नहीं आज तो ...! जब से पारीतोष से बात हुई है तब से मात्र सुबह होने का ही तो इंतजार किया है प्रत्युषा ने ...

आखिर ग्रैजुएशन के उन मस्ती औए उमंग भरे दिनों का जिक्र अपने दोस्तों की याद को और करीब ले आया था। उन्हीं यादों में से एक पारीतोष भी कुछ ज्यादा ही समीप हो आया। इन बीते दों सालों में लगभग हर महीने ही सबसे बात की प्रत्युषा ने, लेकिन इस बीच पारीतोष की आवाज ने हमेशा ही दिल की धड़कनों को तेज किया था। इन सब के बीच वह यह भी जानती थी कि उनकी दोस्ती में हंसी मजाक से बढ़कर कुछ और नहीं। हां, यह जरूर है कि हर मुश्किल में हाथ थामे रहे थे वे सभी दोस्त ... एक दूसरे की टांग खींचने के बीच और अपनी हंसी ठिठोली के अतिरिक्त किसी तीसरे के बारे में सोचने तक का वक्त नहीं।

लेकिन आज अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हुए उन सभी से दूर होकर भी, एहसासों में करीबी बरकरार थी। किसी ने कभी प्रतीत ही नहीं होने दिया कि मृदुला, पारीतोष, संकल्प, हर्ष, गुंजन, वेदांत, वैभव उससे दूर हैं। हर हाल में खुश और जरूरत में साथ ... बिना एक दूसरे से कहे कि वो दोस्त हैं,  वे सभी बहुत करीबी दोस्त बने रहे।

पारीतोष ने कई बार बातचीत करते हुए प्रत्युषा से हंसी मजाक में कहा था कि उसके लिए अब कोई गर्लफ्रैंड ही ढ़ूढ़ ले और हर जवाब देने से पहले मन में एक आवाज उठती मैं ...  पर वो आवाज दिल की परतों से बाहर प्रत्युषा के अतिरिक्त किसी ने भी कभी नहीं सुनी। कल शाम को ही फिर पारीतोष ने प्रत्युषा को फोन कर नींद से जगाया था और उसे मिलने आने की खबर दी थी। साथ ही उससे बाहर घुमाने का कुछ समय भी मांगा था ... अकेले ही।

आज तो बस मन हवा से भी तेज, बस उड़े जा रहा था प्रत्युषा का। अब वो समय भी आया जब प्रत्युषा कैंटीन में खड़ी बस दस बजने के इंतजार में न जाने कितनी बार अपनी घड़ी को घुमा-घुमा कर देखने लगी। लेकिन कैंटीन के बाहर वाले रास्ते पर रविवार होने के कारण कोई भी नजर नहीं आ रहा था और ना ही वो दिख रहा था जिसकी तलाश में टकटकी लगाएं थीं ये आंखे ......

वह दिन भी आज आँखों के सामने प्रत्यक्ष था जब पारीतोष को पहली बार क्लास में देखकर बस उसका नाम जानने की होड़ में कितने पापड़ बेलने पड़े थे उसे... यह ख्याल आँखों में जब तक दबी हंसी लाया तभी अचानक मोबाईल में टैक्स्ट दिखा। पारीतोष तो नहीं पहुंच पाया अभी तक लेकिन उसका टैक्स्ट ...

इस टैक्स्ट मे न जाने ऐसा क्या पढ़ लिया प्रत्युषा ने कि वो सकपका गई। आंखों में न जाने क्यों पानी भी भर आया ...  उसकी खुशी ऐसा सैलाब बन चुकी थी जो अब केवल बह जाने को उमड़ रहा था। पारीतोष तो उसके शहर में अपने लिए पसंद की गई लड़की देखने आया था। उसके मम्मी-पापा ने इसीलिए तो उसे वहां जाने को कहा था और पारीतोष ने ना आने का कारण बताते हुए अपना रिश्ता पक्का होने की खुशखबरी ही तो दी थी टैक्स्ट से अपनी दोस्त प्रत्युषा को ...    
                                                                                      
                                                                                          मीनाक्षी उनियाल





यादों के झारोखे से...

’’मत जाओ न ऐसे...घर जाना है मुझे..... नहीं पढ़ना यहां सबसे दूर रहकर, मैं यहां किसी को भी नहीं जानती... मेरे बिना वहां घर पर भी तो कोई रह नहीं पाएगा ना.... प्लीज़! मैं भी वापिस जाऊंगी...’’ इन शब्दों ने मानो मेरे पैर जकड़ दिए हो। आज जब हॉस्टल के गेट से गुजरते हुए बाहर खड़ी एक महिला को अपने आंसु छिपाते देखा तो यह कदम ठिठक से गए। धुंधलकों में से मानो कुछ हल्की सी छवि उन महिला से मेल खाती मिली। मैंनें कुछ सोचते-सोचते यह कदम और बढ़ाए तो मानो अतीत का आईना मेरे सामने आ खड़ा हुआ हो। आज मैं हॉस्टल में शायद अपना आखिरी कदम रख रही हूँ । कुछ सामान बाकी है मेरा रुम में... बस उसे लेने ही वापिस आई हूं। आज मेरे हाथ में मेरी जॉब का कॉल लैटर है, मैं आकाशवाणी हैदराबाद में नियुक्त की गई हूं। खुशी संभाले नहीं संभल रही कि पढ़ाई खत्म होते ही विश्वविद्यालय से निकलते हुए एक हाथ में डिग्री है तो दूसरे में नौकरी का कॉल लैटर। जहां पढ़ाई करते हुए हर दिन भविष्य के गर्भ में छिपे रहस्य को जानने में बिताया हो वहां से हाथों हाथ सपनों को अपनी मुट्ठी में लेकर निकलना किसी किला फतह करने से कम नहीं।

लेकिन जो खुशी और मुस्कुराहट आज मिली है वो कभी बहाए गए आंसुओं का ही परिणाम है। यह वही गेट हे जिसे दो साल पहले अचंभे में पार किया था। एक ऐसे माहौल में कदम रखा था जहां से न कोई नाता था, न ही ख्वाब में कल्पना भी ही की थी। पर कहते हैं न कि नियति का विधान तुम्हें वहीं ला खड़ा करता है जहां तुम्हारी सोच न पहुंची हो। मम्मी के साथ ही आई थी अपना सामान लेकर हॉस्टल में पहली बार,  और जब मम्मी की दो बजे की ट्रेन का वक्त पास आया तो दोनों की आंखे आंसुओं से सराबोर थी।

                                                                                             मीनाक्षी उनियाल 

4 comments:

  1. i have no comment dear........nccccc

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  2. timsi ji story bhut achi h....bas ager end me dono mil jate na to ........but nccc .mujhe bhut pasan aai

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    1. thanks divya... next story likhte hue is sujhaav ko jarur dhyaan me rakha jaega

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