1 Dec 2013

तेलंगाना का गठन कहीं देश में बिखराव न ले आए


भारत को तेलंगाना के रूप में 29 वां राज्य सत्ता सरकार के तोहफे की तरह है। इस नए राज्य तेलंगाना पर एक नजर डाली जाए तो पता चलेगा कि राज्य बनने के बाद इसका क्षेत्रफल 1.14 लाख वर्ग किलोमीटर होगा और इसकी आबादी 35.38 करोड़ होगी। आंध्र प्रदेश की 294 विधानसभा सीटों में से जहां 117 विधानसभा सीट तेलंगाना में हैं, वहीँ तेलंगाना क्षेत्र से लोकसभा में 17 सांसद हैं। राजनैतिक परिपेक्ष्य में तेलंगाना के गठन को इसे प्रस्तावित करने वाले दल की जीत के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन ये जीत तो आम जनता की है जिन्होंने इसे मूर्त रूप देने के लिए सरकार को प्रतिबद्ध किया। इसलिए कहा जा सकता है कि एक अलग राज्य के लिए करीब पांच दशक तक चला आन्दोलन नया अध्याय लिखने में पूर्णत: सार्थक हुआ है। लेकिन शुरू से ही कई बुद्धिजीवी इसके पक्ष में तो कई इसके विपक्ष में हैं और सभी के अपने मत और तर्क हैं।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले के पश्चात ट्वीट किया था कि ये आम जनता की जीत है। तेलंगाना के नए राज्य में गठित होने की खबर ने राजनीतिज्ञों को एक नया मुद्दा तो दे ही दिया है लेकिन साथ ही समूचे देश को ये भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं इसी तरह से होते नए राज्यों का गठन भारत को उसके इतिहास में ले जाकर न खड़ा कर दे। इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि जहां हमने अपनी एकता, अखंडता और संप्रभुता को खोया नहीं, वहीँ हम अपनी भारतीयता से भी विमुख हो बैठेंगे।

आंध्र और तेलंगाना को मिलाकर 1 नवंबर, 1956 को गठित हुआ राज्य आंध्र प्रदेश एक बार फिर भाषा के आधार पर विभाजित होकर दो राज्यों में बँट जाएगा। वहीँ भाषिक आधार पर गठित आंध्र प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका विभाजन होगा। वहीँ कांग्रेस कार्य समिति ने तेलंगाना के गठन की मांग करने वाले प्रस्ताव में अगले 10 वर्ष के लिए हैदराबाद को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की संयुक्त राजधानी रहने की बात कही है। तेलंगाना के गठन के लिए केंद्र सरकार ने 2009 से सक्रिय प्रयास शुरू किए थे और इस दौरान किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच पाने के कारण सत्तारूढ़ सरकार को राज्य के चुनाव में काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव से पहले कांग्रेस इस मुद्दे को सुलझाने में लगी है।

अब देखना ये है कि भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिल जाने के बाद जिस तरह हमारे नेताओं ने अलग-अलग रियासतों में बंटे भारत को एकता के सूत्र में बांधे रखने क लिए प्रयास किये थे वे कहीं इस पृथक राज्य के गठन के बाद विफल न हो जाएँ। भारतीय संविधान में एकता, अखंडता, संप्रभुता का उल्लेख मात्र उल्लेख भर नही है बल्कि ये तो ऐसा सूत्र है जो भारत को विश्व में एक अलग पहचान दिलाता है। ऐसे में अलग होते राज्य देश में बिखराव की स्थिति को सामने न ले आए।
मीनाक्षी उनियाल 

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