यात्रावृतांत

  जिंदगी एक सफर है सुहाना.....

  सुहावने मौसम का साथ, गालों को सहलाती मनमोहक ठंडी हवा, एक अच्छे दिन की शुरूआत के लिए इससे अधिक और क्या चाहिए। किंतु 21 सितंबर का दिन और भी खास है हम सब के लिए, आज सब में एक अलग ही जोश व उमंग है। देर तक सोने वाले प्रातः 4.30 बजे ही अपना सामान लिए खड़े थे- हेमकुंड की यात्रा के लिए। बेशक यह यात्रा हमारे तीसरे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम का हिस्सा है किंतु यात्रा के नाम मात्र से ही सब बहुत रोमांचित थे तो मन में भरे उल्लास को शब्दों में व्यक्त कर पाना काफी कठिन है हम सब के लिए। नई सुबह के साथ मन में एक रोमांच, हर्ष व जोश लिए सबने यथासमय पर आगमन हुई बस में एकजुटता के साथ सबका सामान रख अपना स्थान ग्रहण किया। और अब बातें थीं तो जल्द से जल्द गाड़ी के चलने की और इस यात्रा के लिए की गई तैयारियों को मूर्त रूप देने व उन्हें क्रियान्वित करने की। विश्वविद्यालय के परिसर को पीछे छोड़ती गाड़ी, कुछ ही देर में मानो हवा से बातें करने लगी। सितंबर आखिर की यह सुबह हल्के कोहरे की चादर ओढ़े ठंडी हवा के झोंखों से चेहरे को छू कर मानो प्रकृति की आकर से हम सबका खुले हाथों से स्वागत कर रही है। कुछ ही समय में हम ऋषिकेश को पीछे छोड़ते हुए उत्तराखंड की शिवालिक की पहाडि़यों में प्रवेश कर चुके हैं। एक ओर जहां शिवालिक की चट्टानें हमारे साथ थीं वहीं दूसरी तरफ गतिशील गंगा हमें हमारी यात्रा में साथ देने का वादा कर रही है। ऐसे में किशोर दा का गीत याद आ रहा है
 "मचलती हुई हवा के संग-संग, हमारे संग संग चली गंगा की लहरें..."
सफर यूं ही प्रकृति का साथ लिए आगे बढ़ रहा था और सूर्य की किरणें पहाड़ों के बीच से निकलकर हवा का साथ देती हुई मौसम में हल्की-सी गर्माहट ले आई थी। यात्रा का पहला पड़ाव रहा ब्यासी, जहां सबने हल्का फुल्का नाश्ता कर आगे की यात्रा का रुख किया। तद्पश्चात तीनधारा के मनोरम दृश्यों को देखते हुए अगला पड़ाव रहा अलकनंदा व भगीरथी की संगम स्थली देवप्रयाग। संगम के इस आलौकिक व मनोरम दृश्य को सब अपनी आंखों में बसा लेने को आतुर हो उठे। कुछ क्षण मार्ग में बस रुकवाकर हम सभी ने उस नज़ारे को आंखों में कैद कर व कुछ देर टहलकर आगे प्रस्थान किया। देवप्रयाग की आलौकिक सुंदरता देखने के बाद हम ढ़ाई घंटे के समय में श्रीनगर को पीछे छोड़ते हुए अलकनंदा का साथ लिए रुद्रप्रयाग पहुंच गए। अलकनंदा व मंदाकिनी की संगम स्थली रुद्रप्रयाग के मनोरम दृश्य को अपनी आंखों में समाहित किया, तत्पश्चात् आगे की यात्रा का रुख किया। हमें शिक्षकगणों द्वारा पूर्व ही निर्देश थे कि संध्यापूर्व ही गोविंदघाट पहुंचना है क्योंकि अंधेरा हो जाने पर पहाड़ी क्षेत्र में सफर करना औचित्यपूर्ण नहीं। इसीलिए गाड़ी को ज्यादा देर न रुकवाकर, पांचों प्रयागों के अद्भुत सौंदर्य को देखते हुए हम यात्रा का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते गए। तीसरा प्रयाग रहा कर्णप्रयाग- अलकनंदा व पिंडर नदी की संगम स्थली व अगला प्रयाग आया नंदप्रयाग-अलकनंदा व नंदाकिनी की संगम स्थली।
  आज उत्त्राखंड के शिवालिकों में कटे रस्ते से होते हुए, प्रयागों के दर्शन कर व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाते हुउ हम बेहद ही प्रफुल्लित हुए। नंदप्रयाग से आगे की यात्रा में अब बदलाव आने लगा। सूर्य की रोशनी तो पूरी थी पर मौसम में हल्की-सी ठंडक महसूस होने लगी। साथ ही पहाड़ों पर अब पेड़-पौधों में भी बदलाव देखने को मिला, जहां हरियाली तो देखते ही बनती है और साथ ही अब लंबे घने कुछ चीड़ के वृक्ष भी दिखने लगे जो कि यहां के ऊंचाई वाले पहाड़ों (डांडों-क्षेत्रीय भाषा)  में पाए जाते हैं। उत्तराखंड अपने में अद्भुत व आलौकिक संपदा लिए अतुल्य भारत का गौरवमय प्रदेश है, जिसे यात्रा के दौरान हम सभी अनुभव करते हुए आगे बढ़ते रहे। प्रदेश के चमोली जिले में निरंतर यात्रा में बढ़ते हुए हमें मार्ग में पत्थरों के आ जाने से थोड़ा अवरुद्ध उत्पन्न हुआ किंतु संबंधित कर्मचारियों ने तुरंत ही मार्ग को साफ कर यात्रियों की समस्या का निवारण किया। हम सभी ने उस बीच उस समय व अपने साथ को कैमरे की सहायता से यादगार पलों में शुमार किया। कब सुबह से शाम हो गई किसी को पता भी न चला व प्रकृति तो मानो हमें हर पल कुछ नया व अद्भुत दिखा रोमांचित करती रही। जल तो जैसे उन पहाडि़यों में ही समाया हुआ है, कदम-कदम में दिखते झरने इसके द्योतक हैं। जैसे ही हम पांचवें प्रयाग-अलकनंदा और धौलीगंगा की संगम स्थली-विष्णुप्रयाग के  जे पी कंपनी द्वारा बनाए गए यातायात हेतु बने पुल पर पहुंचे तो सामने पहाड़ के दायीं ओर एक दरार में से जल की धारा को बिना किसी स्त्रोत के बहता देख कोई भी हैरान हुए बिना न रह सका। न जानक और कितने ही अद्भुत दृश्य हमारी प्रतीक्षा में आगे हैं।
  घड़ी शाम के 5.30  बजाने लगी और इसके साथ ही हम गोविंदघाट में पहुंच चुके थे। ठंड काफी बढ़ी हुई लगी तो सभी को ऊनी वस्त्र निकालकर पहनना ही पड़ा। गोविंदघाट से ही हमारी वास्तविक यात्रा शुरू होनी थीं। गोविंदघाट से हेमकुंड 19 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इसके लिए हमें पहले घाघंरिया पहुंचना होगा जो कि यहां से 13 कि.मी.  दूर है। जब तक गाड़ी से उतरकर हम सभी प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले रहे थे, हमारे शिक्षकगण सभी के रात्रि विश्राम के लिए वहां स्थित गुरुद्वारे में प्रबंध कर आए। हम सभी ने सामान निकाल कर गुरुद्वारे की ओर रुख किया और वहां पहुंचकर अपना सामान रखकर व हाथ मुंह धोहकर गुरुद्वारे में माथा
टेका। सुबह घांघरिया की ओर रवाना होना है तो सभी ने गुरुद्वारे का प्रसादा (लंगर) चख निश्चित जगह पर रात्रि विश्राम की तैयारी की। आगे की यात्रा में दूरसंचार की सुविधा न होने के कारण सभी ने अपने परिवारजनों से बात कर अपनी कुशलता व आगे की यात्रा में बात न हो सकने की जानकारी दे उन्हे चिंतामुक्त कर रात्रि विश्राम किया। दूरसंचार के लिए वहां बी.एस.एन.एल की सुविधा ही उपलब्ध है जो कि गोविंदघाट से आगे कार्य नहीं करती।
 "एक ओंकार सत्नाम करतापूरक
निर्भय अकालमूूरत अजूनीसहबम गुरूप्रसाद
जप तप आद सच जुगाद सच....."

गुरुबाणी के मधुर स्वरों के साथ सुबह का स्वागत कर सभी 4 बजे उठकर नित्य क्रिया कलापों में व्यस्त हो गए। ठंड तो मानो चरम सीमा पर थी जो कि ठिठुरन के रूप में सभी को प्रभावित कर चुकी थी किंतु गुरुद्वारे में उपलब्ध सेवाओं के कारण यात्रियों के जत्थे पूरे जोश व उल्लास के साथ हंुकारे भर आगे की यात्रा को बढ़ रहे थे। 5ण्30 बजे हमारे विभागाध्यक्ष के निर्देशानुसार हमारी पलटन भी माथा टेककर व हुंकारे के साथ बढ़ चली यात्रा की पगडंडी परं जिस रोमांच का सभी को न जाने कब से इंतजार था आज हकीकत के धरातल पर उतर रहा था। इस पहाड़ी यात्रा को यात्री वहां उपलब्ध खच्चर सेवा व वायु सेवा से भी कर सकते हैं। कांधांे पर जरूरत की साम्रगी लिए हम यात्रा के लिए तैयार थे। आज का रास्ता को 13 कि.मी. का था और चढ़ाई भी थी, लेकिन रास्ता रमणीक था। कदम कदम पर जल धाराएं व पहाडि़यों से फूटते झरनों ने यात्रा को अत्यन्त मनोरम बना दिया। उतार चढ़ाव भरा यह रास्ता सभी ने 8 घंटों में तय किया। आगे का ट्रैक ऊंचाई वाला व दुर्गम था, इसलिए यह पहले ही तय कर लिया गया था कि हम सब आज घंाघरिया में ही रुकेगें व अगले दिन 23 सितंबर को श्रीहेमकुण्ड़ साहिब गुरूद्वारा जाएंगें जो घंाघरिया से 7 कि.मी. दूर है। यह तय हुआ कि हम सभी आज 3 कि.मी. की दूरी पर स्थित ‘फूलांे की घाटी‘ जाएंगें। घंाघरिया में गुरूद्वारे में आज के रहने की व्यवस्था कर हमारा दल फूलों की घाटी का सौंदर्य देखने निकल पड़ा। फूलों की घाटी निश्चित समय के लिए खोली जाती है और हम देरी के कारण फूलों की घाटी की सैर से वंचित रह गए किन्तु प्रवेश द्वार पर जानकारी देते हुए रेंजर ने हमें बताया कि यहाँ पाँच सौ से अधिक खूबसूरत फूलों की प्रजातियाँ पाई जाती है। यह भारत का राष्ट्रीय पार्क तो है ही व साथ ही विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल है। रामायण में जिस संजीवनी बूटी का वर्णन है, हनुमान जी उसकी खोज में यहीं पहुँचें थे। साथ ही यह जानकारी भी दी कि जुलाई व अगस्त के महीनें में यहाँ खिलें फूलों के सौंदर्य का भरपूर लुफ्त उठाया जा सकता है। हम सभी नें वहाँ मिली जानकारी को अपने ज्ञान में शुमार कर वापिस घंाघरिया लौटने की ओर अपना रूख किया किन्तु प्रकृति को तो अभी हमें और अचंभित करना था। हममें से कुछ की नजर ऊँचाई से फूटते झरने पर पड़ी। हमारा रूख अब घंाघरिया की तरफ न होकर उस झरने को देखने को लालायित था। झरनों की सुन्दरता का वर्णन शब्दों में कर पाना शायद उसके सौंदर्य को कम कर दे। इन्द्रधनुष ने ऊँचाई से फूटते उस झरने की खूबसूरती को चार गुना बढ़ा दिया। सभी ने उस झरने के खूबसूरत झरोखे को कैमरे व अपनी स्मृतियों में कैद कर लिया। तत्पश्चात् रात्रि को गुरुद्वारे में विश्राम किया। 23 सितंबर की सुबह 4 बजे तक हम सभी तैयार हो, माथा टेक कर बस गुरूद्वारे के कपाट खुलने का बेसर्बी से इंतजार कर रहे थे। द्वार खुले और श्रीहेमकुण्ड़ के दर्शनों को लालायित यात्री हुंकारे लगा ठिठुरती ठण्ड और अंधेरे को चीरते हुए निकल पड़े। श्रीहेमकुण्ड साहिब सिखों का पवित्र स्थल है जो सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी को समर्पित है। ऐसा मानना है कि सतयुग में उन्होंने असुरो का नाश कर इसी स्थान पर तप किया व यहीं ध्यान करते हुए परमात्मा में लीन हो गए किंतुु कलयुग में उन्होंनें नौवें गुरू के घर जन्म लिया। इसका वर्णन उन्होंनें अपनी जीवनी ‘विचित्र नाटक’ में भी किया है। आगे चलकर गुरू गोविंद सिंह ने सिख धर्म की स्थापना की। श्री हेमकंुज साहिब सात पर्वतीय श्रंृखलाओं से घिरा है।‘विचित्र नाटक’ में भी इसका  उल्लेख है। इन सबके बीचों-बीच एक कंुड है। जिसमें इन सभी का उल्लेख है। घांघकरया से श्री हेमकंुड साहिब 7 किमीण् क्ी दूरी पर है। रास्ता चढ़ाई होने के कारण थोड़ा कठिन था किंतु रूक-रूककर प्रकृति का आनंद लेते हुए रास्ते की कठिनाई की पता नहीं चली। यहाँ भी खच्चरों की सेवा उपल्बध है। यात्रा का यह हिस्सा अत्यंत रोमांचकारी लगा,सभी एक दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए बस बढ़ रहे थे। उदय होेते सूर्य की किरणें बर्फीले पर्वतों पर पड़ती हुई उन्हें सोने सी चमक दक रही थी। साथ ही हम फोटो इत्यादि लेकर प्रकृति के साथ यादगार पलों को संजोए जा रहे थे और 4ः30 घंटे के समय में हम श्रीहेमकुंड साहिब के द्वार पर पहुंच चुके थे। हमारा दल कुंड के पास पहंुचा व मंुह हाथ धो और स्नान कर सभी गुरूद्वारे में माथा टेकने गए। गुरूद्वारे में अरदास कर हम सभी ने वहाँ का प्रसाद चख अपनी यात्रा का भरपूर आनंद उठाया। फिर सभी साथ ही स्थित लक्ष्मण मंदिर के दर्शन किए।‘ब्रह्म कमल’ वहाँ आकर्षण का एक और केंद्र है। ‘ब्रह्म कमल’ को तोड़ने पर राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंध है।वहाँ खिले ब्रह्म कमल के फूलों ने वहाँ की संुदरता को और भी बढ़ा दिया था व साथ वर्णित सातों श्रृंखलाओं पर लगे झंडे पर्वतों की शान को बढ़ा रहे थे।करीब दो घंटे रूकने के बाद घांघरिया की ओर प्रस्थान किया। जाते हुए तो बस दर्शनों की लालसा में बढ़ते गए किंतु वापसी में उतार होने के कारण रास्ता बेहद ही छोटा लग रहा था।जाते हुए जो बर्फ की बनी धारा दिखी थी सभी बस उसी में जा पहुंचे। सभी एक दूसरे पर बर्फ के गोले बना के मारने लगे मानो बचपना वापिस हो आया। न कोई शिक्षक था और न ही कोई छात्र, प्रकृति का आनंद लेते सभी एक समान प्रफुल्लित थे। उस बर्फ की ठंडक तो मानों किसी के हाथों को पता ही नहीं चल पा रही थी।वहाँ का आनंद लेने के बाद हम सभी जल्दी घांघरिया लौट आए।गुरूद्वारे में पहुंच अपना समान लेकर अब हमें लौटना था गोंविदघाट। दिन में ही हम सभी माथा टेक रास्ते पर निकल आए। अभी तक की यात्रा में मौसम भी हमारे साथ था किंतु अचानक घिर आए बादल बारिश आने का अंदेशा देने लगे। विभागाध्यक्ष के नेतृत्व में चलता हमारा दल तेज़ी से बढ़ने लगा।रास्ते में कुछ स्थानीय लोग मिले जो कि कांधों में ब्रह्म कमल लिए चले जा रहे थे। जो वे फूल उनकी कुल देवी की पूजा में अर्पित करते हैं। प्रतिदिन गांव के यह लोग ब्रह्म कमल लेने नंगे पांव चढ़ाई कर उन्हें तोड़ने आते हैं। इन लोगों पर प्रतिबंध नहीं है।फूलों की पवित्रता बरकरार रखने के लिए कांधों पर फूलों की टोकरियां लिए दो व्यक्तियों के, आगे-पीछे व दाएं-बाएं, एक-एक व्यक्ति राह चलते लोगों को उनसे दूर करने के लिए तैनात हुए चलते थे। हम उन ब्रह्म कमलों की सुगंध के कायल हो पीछे-पीछे चलते रहे। किन्तु शायद उन्हें यह उचित नही लगा और आगे का रास्ता दिखा उन्होंने हमें आगे बढ़ जाने का इशारा कर दिया। हम सभी को अब अंधेरा होने से पहले ही घंघरिया लौटना था। कदमों की गति को बढ़ाते हुए हल्की बारिश की बूदों में भीगते शाम 7ः30 बजे तक हम सभी घंाघरिया गुरुद्वारे में आ पहुँचे। अब सभी ने अगली सुबह, हिंदुओ के चार धामों में से एक, बद्रीनाथ जाने की योजना बनाई व 24 सितंबर को घंाघरिया को अलविदा कर वहां से 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित बद्री विशाल के दर्शनों के लिए निकल पड़े। यात्रा तो श्री हेमकुण्ड़ साहिब की निश्चित की गई थी किंतं बद्रीधाम के इतना पास आकर उसके दर्शन न कर पाना तो हाथ आए मौके को गंवाने की तरह था सभी के लिए। पांडुकेश्वर को पार करते हुए 2 घंटे की यात्रा के बाद हम बद्री विशाल जा पहुँचे। किंतु पहले बद्रीनाथ से 3 कि.मी. की दूरी पर माना गांव जाने का तय हुआ तत्पश्चात् बद्री के दर्शन का। कुछ ही समय में सभी भारतीय सीमा के आखिरी गांव में पहुँच चुके थे। माना गांव भी किसी दार्शनिक संपदा से कम नहीं। गणेश गुफा से माना गांव की यात्रा प्रारम्भ कर हमें पता चला कि इसी गुफा में बैठकर गणेशजी ने व्यास जी के आदेश पर महाभारत लिखी थी। कुछ चढ़ाई के पश्चात् आई व्यास गुफा जहां से व्यास जी ने गणेश जी को महाभारत लिखाई। कुछ ही दूरी पर भीम पुल था जो कि सरस्वती नदी का उद्गम स्थल भी है। सरस्वती नदी यहीं से निकल कर प्रयाग में दो नदी में सम्मिलित हो ‘संगम‘ बनाती है। हम स्थानीय लोगों से बातचीत कर व कैमरे में उस रमणीय स्थल को कैद कर बद्रीनाथ लौट आए। चारों ओर से बर्फीली पर्वत श्रृंखलाओ से घिरा यह धाम प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण था। सबसे पहले तप्त कुण्ड़ के गर्म जल में नहाकर हम सभी प्रकृति के अद्भुत खेल से रुबरु हुए। इतनी ठंडी जगह ओर ऊँचे पहाड़ो में गर्म जल का होना अपने में प्राकृतिक चमत्कार से कम न था। स्नान कर हमने मंदिर में दर्शन किए। आज चार धामों में से एक, बद्रीनाथ में ख्ुद को पाकर सब प्रफुल्लित थे। रात वहीं स्थित सेवाआश्रम धर्मशाला में रुककर 25 सितंबर की सुबह 6ः30 बजे दुबारा वापिसी की चाहत अपने मन में लिए सभी गाड़ी में लौटने के लिए बैठ गए। 1 बजे के लगभग रुद्रप्रयाग पहुँच शिक्षकों के नेतृत्व में यह तय हुआ कि पिकनिक के रुप में गंगा किनारे रुक कर यात्रा का समापन भी शुरु हुई यात्रा के रोमांच की तरह होना चाहिए। तो खाने पीने व उसे स्वंय पकाने की सामग्री लिए हम 7 बजे के आसपास ऋषिकेश से 28 कि.मी. पहले उतर गए गंगा जी के किनारे। चँाद की छटा, गंगा का साथ और हम सभी के उत्साह ने उन पलों को जीवन की अमिट यादों में शामिल कर दिया। सभी के मिले-जुले प्रयास से खिचड़ी बनाई गई और उसका स्वाद आज यह यात्रा वृतंात लिखते हुए भी स्मरण हो रहा है। गाड़ी करीब रात्रि 9ः30 बजे काॅलेज परिसर में पहुँच चुकी थी लेकिन पाँच दिनों के यात्रा के साथ को कोई छोड़ना नहीं चाह रहा था लेकिन जीवन में निरंतर गतिशील रहकर ही तो इस यात्रा का भरपूर आनंद लिया जा सकता है। इस शानदार यात्रा की यादों को लेकर हम अपने हाॅस्टल और अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आए और अगली सुबह सब अपने दैनिक कार्यों में लग गए।



4 comments:

  1. This article has published on www.vijayvani.in

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    1. thanks for publishing but it might be better that before publishing you took permission.

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  2. बहुत सुंदर वर्णन, रोचक प्रस्तुति।

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