स्वतंत्रता के बदलते मायने
इस वर्ष हम स्वतंत्रता के 65 साल पूरे कर चुके हैं। यह हम सब जानते हैं कि अंग्रेजों की गुलामी की बेडि़यों से हमें इस दिन स्वतंत्रता सेनानियों ने किस शिद्दत के साथ अपने प्राणों की कुर्बानी देकर आजा़द करवाया था। यह आज की युवा पीढ़ी शायद ही समझ पाए कि आज के दिन का महत्व केवल देश भक्ति गीत गााकर या सुनकर या देश भक्ति नाट्य प्रस्तुति करने मात्र से पूर्ण नहीं होगा। अपितु स्वतंत्रता दिलाने वाले शहीदों के द्वारा अपने देश की गरिमा व मान-सम्मान को अपना मानकर उसकी प्रतिष्ठा बनाने से सिद्ध होगा।
यदि हम अपनी युवा पीढ़ी की शिक्षा में विदेशी गुणों व नियमों की अपेक्षा अपनी संस्कृति के विचार व पारिवारिक संस्कार पर अधिक बल देंगंे तो हम अपनी सांस्कृतिक और संस्कारी धरोहर को बचाने में सफल होंगे। एक युवा होते हुए मैं खुद यह सोचने पर मजबूर हूं कि क्या हम जिस राह पर अग्रसित हैं वह सही दिशा की ओर जा रही है? किंतु इसका उत्तर हमें अपने विचारों को तराशकर अपने ही अंदर खोजना होगा। ’देश ने क्या किया’ इसका उत्तर चाहने वालों को ’हमने देश के लिए क्या किया’ इस प्रश्न को हल करना होगा। देशवासी ही अपने कार्यों से देश की गरिमा व उसकी प्रतिष्ठा बनाते हैं। इसलिए देश के नागरिक होते हुए हमें स्वयं ऐसे कार्य करने होंगे जिससे हम इसकी उन्नति में योगदान दे सके। और मुझे यह पूर्ण आशा भी है कि हम सब के भीतर कहीं न कहीं देश के प्रति कुछ करने की छोटी ही सही किंतु कुछ चिंगारी तो है जिसे बस हमें ख्ुाद से अवगत करवाना है। हमें जो कुछ भी मिल रहा है सब देश का ही है जिसे अपने कर्तव्य की भांति हमें लौटाना भी है।
मीनाक्षी उनियाल
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