गूढ़ रहस्य
जीवन के इस गूढ़ रहस्य को
कौन समझा है मित्र आजतक
क्यूं पीड़ा फिर तुम्हें अकिंचन
बढ़ चलो तुम भी अपने पथ पर
व्यथा जिसे कहते हैं व्यक्त कर
मात्र भ्रम है माया का मित्रवर
बस अपना तुम नीति ज्ञान कर
रखो वेदना अपने ही भीतर
तुम भी तो कल देख बूझ कर
अग्रसित होंगें जीवन के पथ पर
फिर क्यों अपने को वेदित कर
व्यर्थ कर रहे सुनहरा कालचक्र
जीवन के इस गूढ़ रहस्य को
अब खोज रहे अपने ही भीतर
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